कुम्भ 2017-2018
कुंभ पर्व हिंदू धर्म का
एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में
स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष इस पर्व का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। २०१३ का कुम्भ प्रयाग में हुआ था।
खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के
दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने
से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है।


अर्ध कुम्भ
‘अर्ध’ शब्द का अर्थ होता है आधा और इसी कारण बारह वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाले पूर्ण कुम्भ के बीच अर्थात पूर्ण कुम्भ के छ: वर्ष बाद अर्ध कुंभ आयोजित होता है। हरिद्वार में पिछला कुंभ 1998 में हुआ था।
हरिद्वार में 26 जनवरी से 14 मई 2004 तक चला था अर्ध कुंभ मेला, उत्तरांचल राज्य के गठन के पश्चात ऐसा प्रथम अवसर था। इस दौरान 14 अप्रैल 2004 पवित्र स्नान के लिए सबसे सुभ दिवस माना गया।
पौराणिक कथाएँ
सागर मन्थन
कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।
इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।
अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।
जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।


विशेष दिन 2017-2018….
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पौष पूर्णिमा - 2 जनवरी 2018
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माघी पूर्णिमा - 31 जनवरी 2018
इलाहाबाद.संगम नगरी में कमिश्नर श्री राजन शुक्ला की अध्यक्षता में अर्द्ध कुंभ 2018-19 की तैयारियों को लेकर अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी और अन्य अखाड़ों के पदाधिकारियों के साथ माघ मेला प्रशासन के अस्थाई कार्यालय में बैठक संपन्न हुई। बैठक में महंत ने जिन अखाड़ों के पास स्थाई जमीन नहीं है, उन्हें उपलब्ध कराए जाने की मांग की गई। मेला प्रशासन से साधु-संतो तथा सन्यासियों के प्राण त्यागने पर उनकी समाधि के लिए गंगा के किनारे जमीन दिए जाने का प्रस्ताव रखा।


साथ ही मेले के दौरान आने वाले वृद्धों एवं अशक्तजनों को मेले तक लाने हेतु प्रशासनिक व्यवस्था का प्रस्ताव रखा। उन्होंने बताया कि सीसीटीवी तथा ड्रोन के माध्यम से मेले पर नजर रखी जाएगी और जगह- जगह इसका कंट्रोल रूम बनाया जाएगा। माघ मेले का पहला स्नान पर्व पौष पूर्णिमा 12 जनवरी को है। 10 जनवरी तक मेला क्षेत्र में बड़े संतों का प्रवेश हो जाएगा। दंडी बाड़ा, त्रिवेणी मार्ग एवं काली सड़क, संगम लोअर, आचार्य बाड़ा, महावीर मार्ग आवंटन का काम पूरा होने से सुविधा पर्ची पाने के बाद ज्यादातर संस्थाओं ने पंडाल लगाने का काम शुरू कर दिया है। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का शिविर तेजी से बनाया जा रहा है। सचिव आचार्य छोटेलाल मिश्रा के मुताबिक स्वामी वासुदेवानंद पौष पूर्णिमा को शिविर में प्रवेश करेंगे। दंडीनगर में अखिल भारतीय दंडी संन्यासी प्रबंधन समिति के अध्यक्ष स्वामी विमलदेव आश्रम, स्वामी महेशाश्रम, महामंत्री स्वामी ब्रह्माश्रम, सतुआ बाबा संतोष दास, कपिलदेव दास नागा, रामकृष्ण मिशन आदि के शिविर लगाए जा रहे हैं।